एक डायन का साया भूत की कहानी, ghost stories

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जंगल मैं डायन का साया

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आज मैं आपको एक ऐसी डायन के कहानी के बारे मैं बताने जा था हु जिसने पुरे गांव वालो की नाक मैं दम कर रखा था और पूरा गांव उससे बहुत परेशान भी था. एक बार की बात है जब प्रमोद अपने ऑफिस में अपनी सीट पर बैठकर फाइलों को उलट पलट रहे थे. उनका ऑफिस गांव जो की सहारनपुर मैं है वहा था. जहाँ जाने के लिए कच्ची सड़कों से होकर जाना पड़ता था. ऑफिस के आस पास में जंगली पौधों की अधिकता थी. ऑफिस के मुख्य दरवाजे को छोड़ दें तो बाकी हिस्से पूरी तरह से घाँस फूँस आदि से ढंके लगते थे.

 

ऑफिस के कमरों की खिड़कियों आदि पर लंबे लंबे घास फूँसों का साम्राज्य था. दिन में भी ऑफिस में एक हल्का अंधकार पसरा रहता था, जिससे ऐसा लगता था कि यह ऑफिस हरी भरी वादियों में शांत मन से बैठा हुआ किसी गहरे चिंतन में डूबा हुआ हो. क्योंकि इस ऑफिस में कुल कर्मचारियों की संख्या मात्र 5 ही थी जिसमें से एक कर्मवीर कुमार थे, जो चपरासी के रूप में यहाँ अपनी सेवा दे रहे थे. कर्मवीर कुमार ही वह व्यक्ति थे जिनके कार्य व्यवहार से यह शांत ऑफिस कभी कभी मुखर हो उठता था और कर्मचारियों की हँसी ठिठोली से जाग उठता था.

कर्मवीर कुमार , पास के ही एक गाँव के रहने वाले थे और प्रतिदिन कोई न कोई असहज घटना ऑफिस के बाकी 6 कर्मचारियों को सुनाया करते थे. वे विशेषकर जब भी ऑफिस में प्रवेश करते तो सबसे पहले प्रमोद के कमरे में जाते और राम राम कहने के साथ ही शुरू हो जाते कि कल तो गाँव में गजब हो गया था. सचिन को जंगल में डायन ने पकड़ लिया था तो मनोज का सामना एक भयानक भूत से हो गया था. जब तक कर्मवीर कुमार सभी कर्मचारियों से मिलकर कुछ भूत प्रेत, गाँव गड़ा की बातें नहीं बता लेते, उन्हें चैन नहीं पड़ता था.

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कोई कर्मचारी कर्मवीर कुमार की बातों को सहजता से सुनता तो कोई केवल हाँ हूँ करके उस ओर कान नहीं देता और उन्हें स्टोप जला कर चाय बनाने के लिए कह देता या पानी की ही माँग करके उनसे बचने की कोशिश करता. पर कर्मवीर कुमार की बातों को प्रमोद बहुत ही सजगता से सुनते और पूरा ध्यान देते हुए बीच बीच में हाँ हूँ करने के साथ कुछ सवाल भी पूछते. एक दिन की बात है, कर्मवीर कुमार ऑफिस थोड़ा जल्दी ही पहुँच गए और सीधे प्रमोद के कमरे में घुस गए. पर उस समय प्रमोद अपनी कुर्सी पर नहीं थे,

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शायद वे अभी ऑफिस पहुँचे ही नहीं थे. कर्मवीर कुमार थोड़ा डरे सहमे लग रहे थे और बार बार अपने माथे पर आ रहे पसीने को गमछे से पोछ रहे थे. वे ज्यों ही कमरे से बाहर निकले त्यों ही ऑफिस के प्रांगण में उन्होंने प्रमोद को अपनी साइकिल को खड़े करते हुए देखा. वे दौड़कर प्रमोद के पास पहुँच गए और बिना जयरम्मी किए ही हकलाकर, घबराकर बोले. कल रात को तो गजब हो गया. मेरा पूरा परिवार आफत में आ गया है. समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूँ. प्रमोद ने उन्हें अपने कमरे की ओर चलने का इशारा करते हुए आगे आगे तेज कदमों से अपने ऑफिस कक्ष में प्रवेश किए. फिर एक कुर्सी पर कर्मवीर कुमार को बैठने का इशारा करते हुए अपने झोले को वहीं मेज पर रखकर 1 गिलास में पानी लेकर कक्ष के बाहर आकर हाथ ओथ धोए.

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उसके बाद कमरे में लगे भोले बाबा की फोटो को अगरबत्ती दिखाने के बाद अपनी कुर्सी पर बैठते हुए कर्मवीर कुमार से बोले, कर्मवीर कुमार, अब अपनी बात पूरी विस्तार से बताइए. उनकी अनुमति मिलते ही कर्मवीर कुमार कहना शुरू किए, कल मैं जब शाम को घर पर पहुँचा तो पता चला की मेरी बहू कुछ लकड़ी आदि की व्यवस्था करने जंगल की ओर गई थी और वहीं उसे किसे डायन ने धर लिया था. वह इधर उधर जंगल में भटक रही थी तभी कुछ गाँव के ही गाय बकरी के चरवाहों की नजर उस पर पड़ी. वे लोग स्थिति को भाँप गए और मेरी बहू को पकड़कर घर पर छोड़ गए. फिर गाँव के ही मोनू बाबा ने झाँड़ फूँक की उसके बाद उस डायन से छुटकारा मिला. पर आज सुबह फिर से उस पर डायन हावी हो गई है, सुबह से ही मोनू बाबा उसे उतारने में लगे हैं, पर वह छोड़कर जाने का नाम ही नहीं ले रही है. समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं. कर्मवीर कुमार की बातों को सुनकर प्रमोद थोड़े गंभीर हुए और अचानक पता नहीं क्या सूझा कि हँसने लगे.

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प्रमोद की यह हालत देखकर कर्मवीर कुमार तो और भी हक्के बक्के हो गए. उन्हें समझ में नहीं आया कि आखिर इनको क्या हो गया, कहीं इनपर भी तो किसी भूत प्रेत का साया नहीं पड़ गया. अभी कर्मवीर कुमार यही सब सोच रहे थे तभी प्रमोद अपनी कुर्सी पर से उठे और बिना कुछ बोले कर्मवीर कुमार को अपने पीछे आने का इशारा करते हुए कमरे से बाहर निकल गए. कमरे से बाहर निकल कर प्रमोद पास की ही एक झाँड़ी से कुछ पत्तों को तोड़ा और मन ही मन कुछ मंत्र बुदबुदाए फिर कर्मवीर कुमार को उन पत्तों को देते हुए बोले कि आप इसे पीसकर अपनी बहू को पिला दें, और अपने घर पर ही रूकें. मैं ऑफिस में कुछ जरूरी काम काज निपटाकर अभी 3-4 घंटे में आपके घर पर पहुँचता हूँ. कर्मवीर कुमार बिना कुछ बोले, केवल सिर हिलाए और उन पत्तों को लेकर घर की ओर बढ़ें. रास्ते में उन्हें केवल एक ही बात खाए जा रही थी कि प्रमोद को यहाँ आए 5 साल हो गए पर कभी उन्होंने इस बात का जिक्र नहीं किया कि वे भूत प्रेतों को उतारना भी जानते हैं.

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कहीं वे मजाक में तो इन पत्तों को तोड़कर, झूठ मूठ में कुछ बुदबुदाकर मुझे नहीं दे दिए. पर प्रमोद ऐसा नहीं कर सकते, वे तो बहुत गंभीर आदमी हैं, और हमारी सारी बातों को भी तो बहुत गंभीरता से लेते हैं और समय समय पर हर प्रकार से हमारी मदद भी तो करते रहते हैं. ना ना, वे मेरे साथ मजाक नहीं कर सकते. यही सब सोचते सोचते कर्मवीर कुमार घर पर पहुँच गए. घर के बाहर 11-12 गाँव घर के ही लोग बैठे नजर आए. एक खटिया पर मोनू बाबा भी बैठकर लोगों से कुछ बात चीत कर रहे थे. कर्मवीर कुमार को देखते ही मोनू बाबा बोल पड़े, कर्मवीर कुमार, यह डायन तो बहुत ढीठ है, रात को छोड़ तो दी थी पर सुबह फिर से आ गई. 3 4 घंटे मैंने कोशिश किया पर छोड़कर जाने का नाम ही नहीं ले रही है, अभी भी आंगन में नाच कूद रही है.

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मेरे मंत्रों का अब तो उस पर कुछ असर भी नहीं हो रहा है, यहाँ तक कि मेरा भी मजाक उड़ा दी. इतना सब होने के बाद मैं उसे छोड़कर बाहर आकर बैठ गया हूँ. मैं अब कुछ नहीं कर सकता. वह सब अजमा लिया. कर्मवीर कुमार मोनू बाबा के ही बगल में बैठते हुए अपनी लड़की को आवाज लगाए, उनकी लड़की घर में से दौड़ते हुए बाहर निकली. फिर कर्मवीर कुमार ने उन पत्तों को उसे देते हुए कहा कि अभी इसे पीसकर बहू को पिला दो. अगर ना नूकर करती है तो जबरदस्ती पिलाओ. इसके बाद कर्मवीर कुमार की लड़की उन पत्तों को लेकर घर में गई तथा उन पत्तों को पीसकर अपनी भाभी को पिलाई.

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अरे यह क्या, एक घूँट अंदर जाते ही कर्मवीर कुमार की बहू तो काफी शांत हो गई और वहीं आंगन में ही एक तरई पर बैठ गई. अब उसके व्यवहार में काफी अंतर आ गया था. उसका कूदना नाचना बंद हो गया. कर्मवीर कुमार की लड़की दौड़ते हुए घर में बाहर निकली और कर्मवीर कुमार की ओर देखकर बोली. बहू को अब आराम हो गया है, वे आंगन में ही अब शांति से बैठ गई हैं. बाहर जितने लोग बैठे थे, वे सब हतप्रभ हो गए. आखिर जो डायन इतने बड़े सोखा से बस में नहीं आई, वह दो चार पत्तों को पिलाने से कैसे बस में आ सकती है.

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आखिर वे कैसे पत्ते थे. क्या किसी धर्म स्थान से लाए गए थे या किसी बहुत बड़े पंडित, ओझा, सोखा आदि ने दिए थे. वहाँ बैठे लोगों में से एक ने कर्मवीर कुमार की ओर देखा पर कुछ बोले इससे पहले ही कर्मवीर कुमार ने उन पत्तों के बारे में बता दिया. सभी लोग बिन देखे उस प्रमोद के प्रति नतमस्तक हो गए. मोनू बाबा ने कहा कि वास्तव में आपके प्रमोद तो बहुत पहुँचे निकले. जिस डायन को बस में करने के लिए मैंने सारे के सारे उपाए अपना लिए, उसे उनके मंत्रित दो चार पत्तों ने बस में कर लिया. फिर तो कर्मवीर कुमार थोड़ा तन कर बैठ गए और लगे प्रमोद का गुणगान करने. अभी वे लोग आपस में बात कर ही रहे थे तभी प्रमोद की साइकिल वहाँ रूकी. प्रमोद को देखते ही कर्मवीर कुमार दौड़कर प्रमोद के हाथ से साइकिल लेकर खुद ही खड़ी करते हुए बोले, प्रमोद , आपके पत्तों ने तो कमाल कर दिया. अब बहू काफी अच्छी है और शांति से आंगन में बैठी है. प्रमोद के इतना कहते ही वहाँ बैठे सभी लोग खड़े हो गए.

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प्रमोद सबका अभिवादन स्वीकार करते हुए उन लोगों के बीच ही एक खाट पर बैठ गए. फिर प्रमोद ने कर्मवीर कुमार की बहू को घर में बाहर बुलवाया. वह काफी शांत थी पर प्रमोद को लगा कि अभी भी वह डायन यहीं है और पत्ते का असर खत्म होते ही फिर से इसे जकड़ लेगी. प्रमोद ने कर्मवीर कुमार की बहू को अपने पास बैठने का इशारा करते हुए कुछ मंत्र बुदबुदाने लगे. अरे यह क्या, कर्मवीर कुमार की बहू घबराकर बोल उठी, मुझे छोड़ दीजिए, मैं जा रही हूँ, मैं अब कभी भी इसे नहीं पकड़ूँगी. मुझे जाने दीजिए, मुझे जाने दीजिए, मैं जल रही हूँ, मुझे छोड़ दीजिए. उस डायन को इस तरह गिड़गिड़ाते हुए देखकर कर्मवीर कुमार की काफी हिम्मत बढ़ गई. वे बोल पड़े, प्रमोद , इसे छोड़िएगा मत. पर वह डायन कर्मवीर कुमार की ओर ध्यान न देते हुए, प्रमोद की ओर दयनीय स्थिति में देखते हुए अपने प्राणों की भीख माँगती रही. प्रमोद काफी गंभीर लग रहे थे. वे कर्मवीर कुमार की बहू की ओर गुस्से से देखते हुए बोले कि तुम कौन हो और इसे क्यों पकड़ीं. इस पर वह डायन गिड़गिड़ाते हुए बोली की मैं पास के ही जंगल में रहती हूँ. मैं बंजारा परिवार से हूँ, एकबार हमारे परिवार ने इसी जंगल के बाहर अपना टेंट लगाया था. शाम के समय मैं लकड़ी लेने जंगल में प्रवेश की. मुझे पता नहीं चला कि कब मैं घने जंगल में पहुँच गई और रास्ता भी भटक गई. तब तक रात भी होने लगी थी. जंगल में पूरा अंधेरा पसरना शुरू हो गया था. मैं थोड़ी डर गई थी पर हिम्मत नहीं खोई थी.

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अचानक मेरे दिमाग में एक विचार आया. मैंने सोचा कि रात के इस अंधेरे में अब रास्ता खोजना ठीक नहीं. कहीं किसी जंगली जानवर की शिकार न हो जाऊँ. इसलिए मैंने हिम्मत करके वहीं एक मोटे जंगली पेड़ पर चढ़कर बैठ गई. मैंने सोचा कि सुबह होते ही मेरे परिवार के लोग जरूर मुझे खोजने आएंगे और अगर नहीं भी आए तो मैं दिन में अपना रास्ता खोज लूँगी. पर वह रात शायद मेरे वन की समाप्ति के लिए ही आई थी. मैं जिस पेड़ पर चढ़कर बैठी थी, उसी पर एक प्रेत का डेरा था. आधी रात तक तो सब कुछ एकदम ठीक ठाक था पर उसके बाद अचानक वह प्रेत कहीं से उस पेड़ पर आ बैठा. उसके आते ही जैसे पूरे जंगल में भयंकर तूफान आ गया हो. अनेकों पेड़ों की डालियाँ तेज हवा से डरावने रूप से हिलने लगी थीं. मैंने सोचा कि अब इस समय बस एक ही रास्ता है कि इसकी बातों को मान लिया जाए और दिन उगने के बाद यहाँ से खिसक लिया जाएगा. मैंने उसके हाँ में हाँ मिलाते हुए अपनी सहमति दे दी. मुझे क्या पता था कि यह सहमति मुझपर बहुत भारी पड़ेगी. इतना कहने के बाद कर्मवीर कुमार की बहू पर सवार वह चुड़ैल फूट फूटकर रोने लगी.

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प्रमोद थोड़े भावुक हो गए और उसके प्रति थोड़ी नरमी दिखाते हुए पानी भरा लोटा उसको पीने के लिए दे दिए. दो चार घूँट पानी पीने के बाद उसने फिर से कहना शुरू किया. मेरी सहमति देने के बाद वह प्रेत पता नहीं कहाँ गायब हो गया, उसके गायब होते ही मैंने थोड़ीं चैन की साँस ली पर यह क्या अभी 10-15 मिनट भी नहीं बीते होंगे कि उस जंगल में जैसे भूचाल आ गया हो. एक बहुत बड़ा तूफान आ गया हो. कितने पेड़ों की पता नहीं कितनी डालियाँ टूटकर धरती पर पड़ गईं. कम से कम सैकड़ों भूत प्रेत वहाँ उपस्थिति हो गए थे. चारों तरफ चीख पुकार मचा हुआ था. कुछ डरावनी अट्टहास कर रहे थे तो कुछ इस डाली से उस डाली पर कूद फाँद रहे थे, तो कुछ ताली बजाकर नाच रहे थे. मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है. तब तक वही प्रेत फिर से मेरे पास प्रकट हुआ और बोला की विवाह की व्यवस्था करने चला गया था. अपने परिवार वालों को बुलाने चला गया था. शादी में इन सबको भी तो शरीक करना होगा. अरे यह क्या अब तो मेरी शामत आ गई. पूरा शरीर पीला पड़ गया. कुछ बोलने की हिम्मत नहीं रही, तभी अचानक एक प्रेतनी वहां प्रकट हुई और उस प्रेत से लड़ने लगी. वह प्रेतनी बोल रही थी कि मेरे रहते तूँ दूसरी शादी करेगा, कदापि नहीं, कदापि नहीं. मैं ऐसा नहीं होने दूँगी और इतना कहने के साथ ही उस डायन ने उस डाल से मुझे धक्का दे दिया और जमीन पर गिरने के कुछ ही समय बाद मेरी समाप्त हो गई थी. इतने कहने के साथ ही वह डायन फिर से रोने लगी थी. इसके बाद प्रमोद ने उस डायन को चुप रहने का इशारा करते हुए कहा कि आज के बाद तूँ इन गाँव वालों को कभी परेशान नहीं करोगी.

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डायन ने हामी भरते हुए कहा कि ठीक है. पर मैं तो एक बहुत ही छोटी आत्मा हूँ. इन पास के जंगलों में पता नहीं कितनी भयानक भयानक आत्माएँ विचरण करती हैं. आप उन सबसे इस गाँव वालों को कैसे बचा पाएँगे. उस डायन की इस बात को सुनते हुए प्रमोद हल्की मुस्कान में बोले. तूँ तो बकस इन लोगों को, बाकी भूत प्रेतों से कैसे निपटना है, वह तूँ मुझपर छोड़. इसके बाद प्रमोद ने लोगों को अब कभी न पकड़ने की बात उस डायन से तीन बार कबूल करवाई तो दोस्तों इस तरह से प्रमोद ने उस डायन से गांव वालो को आखिर मैं मुक्ति दिला ही दी और उसके बाद से गांव वाले चेन से अपने जीवन का यापन करने लग गए.

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