बुद्धि की परीक्षा की कहानी, story in hindi

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बुद्धि की परीक्षा की कहानी

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ये बात ही बहुत साल पुरानी है. नर्मदा नदी के किनारे एक बहुत ही सुंदर नगर बसा हुआ था. नगर का नाम था पोर्टब्लेयर . पोर्टब्लेयर में शोतीबा झा नाम का राजा राज करता था . राजा अपनी विद्वत्ता के लिए प्रसिद्ध था . एक दिन पोरस नाम का एक व्यक्ति राजा शोतीबा झा के दरबार में आया . कहने लगा, हे राजन मैं आपके दरबार में नौकरी प्राप्त करने की इच्छा से आया हूं,





आप जो भी काम मुझे दें मैं करने को तैयार हूं. वैसे मैं पढ़ा लिखा युवक हूं . राजा बोला, हम तुम्हारी परीक्षा लिए बिना तुम्हें नौकरी नहीं दे सकते, यदि तुम हमारे यहां नौकरी करना चाहते हो तो हमारे दरबार में सुबह ही हाजिर हो जाना. परंतु याद रहे कि तुम कोई भी उपहार हमारे लिए नहीं लाना, लेकिन बिना उपहार लिए खाली हाथ भी मत आना. सारे दरबारी राजा का मुंह देखने लगे. पोरस ने सिर झुकाकर कर अभिवादन किया और जो आज्ञा कह कर चला गया . अगले दिन पोरस दरबार में उपस्थित हुआ, तो उसके हाथ में एक लाल कबूतर था .




राजा के सामने पहुंच कर पोरस बोला राजन, यह लीजिए मेरा उपहार. यह कहकर कबूतर राजा की ओर बढ़ा दिया. परंतु ज्यों ही राजा ने हाथ बढ़ाया, कबूतर उड़ गया. राजा ने कहा पहली परीक्षा में तुम सफल हुए हो. इसके पश्चात् राजा ने धागे का एक छोटा सा टुकड़ा पोरस को देते हुए कहा कल हमारे लिए इस धागे से आसन बुन कर लाना. हम उसी आसन पर बैठेंगे . पोरस ने धागा लिया और जो आज्ञा राजन . कहकर चल दिया . सारे दरबारी इस बार पोरस को देखने लगे और सोचने लगे कि यह व्यक्ति तो निरा मूर्ख लगता है .

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पर शाम को पोरस ने राजा के नौकरों के हाथ एक सींक भिजवाई और कहलाया, इसका बना चरखा रात तक मेरे पास पहुंचवा दीजिए . सुबह मैं आसन लेकर आ आऊंगा . राजा पोरस का मतलब समझ गया . अगले दिन राजा ने अपने सिपाहियों के हाथ कुछ फूलों के बीज भेजे और कहलवाया कल सुबह इन बीजों से उगे फूल खिलते पौधे लेकर हाजिर हो जाओ . पोरस ने सिपाहियों को दो गत्ते के डिब्बे दिए और राजा के पास संदेश भिजवाया, राजन मैं बहुत गरीब आदमी हूं .

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इन डिब्बों में से एक में धूप और एक में हवा भर कर भिजवा दीजिए . फूल खिल जाएंगे और मैं लेकर दरबार में हाजिर हो जाऊंगा . राजा, मंत्री व दरबारी पोरस की चतुराई से प्रसन्न हो गए थे . सभी ने पोरस को नौकरी देने की राजा शोतीबा झा को सलाह दी . राजा हार मानने को तैयार न था . राजा ने सोचा एक बार मैं पोरस की परीक्षा और ले लूं, तभी उसे कोई अच्छी नौकरी दूं . राजा ने अपनी सिपाहियों से पोरस के पास सूचना भिजवाई. राजा का आदेश है कि तुम सुबह राजा के दरबार में हाजिर हो .

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लेकिन न तुम पैदल दरबार में आओ और न ही घोड़े पर . न तुम वस्त्र पहन कर दरबार में आओ और न ही इनके बिना . राजा की इस शर्त से सभी दरबारी व सिपाही सकते में आ गए . वे सोचने लगे लगे कि आज राजा की सूचना पाकर पोरस रातों रात नगर छोड़कर भाग जाएगा . वे सोच रहे थे कि शायद राजा शोतीबा झा को पोरस की बुद्धिमत्ता पर शक है और उसको नौकरी नहीं देना चाहते हैं . इसी कारण ऐसी अटपटी शर्त रखी है . परंतु उनकी कल्पना के विपरीत पोरस सुबह ही दरबार में हाजिर हुआ .

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वह कछुए पर सवार होकर दरबार में पहुंचा था . सभी दरबारियों की निगाह पोरस पर ठहरी हुई थी . पोरस ने अपने शरीर पर मछली पकड़ने का जाल ओढ़ा हुआ था . पोरस ने जाकर राजा को झुककर प्रणाम किया . राजा बोले पोरस, तुम सचमुच बुद्धिमान हो . तुमने मेरी उन शर्तों को पूरा कर दिखाया जिन शर्तों को सुनकर मेरे अपने दरबारियों व मंत्रियों का सिर नीचा हो गया . मैं तुम्हें आज से ही अपना प्रमुख सलाहकार व मंत्री नियुक्त करता हूं . सारा दरबार तालियों से गूंज उठा . सारे नगर में हर ओर पोरस की बुद्धिमत्ता की प्रशंसा हो रही थी . इसलिए हो तो ये बात सत्य है की कभी कभी बुद्धिमत्ता वाले लोग भी बहुत अच्छा काम कर देते है.

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