तीसमारखाँ की कहानी, story in hindi

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तीसमारखाँ की कहानी

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ये कहानी एक ऐसे लड़के की है जो की बेहत ही आलसी हुआ करता था किसी जमाने मैं, लेकिन एक दिन वो भी बन गया तीसमारखाँ, सभी उसे खानो मैं खान तीसमारखाँ के नाम से जानने लग गए. गोलू एक नटखट लड़का था . उसका पढ़ाई में बिल्कुल मन नहीं लगता था .

घर वाले उसे समझाते थे कि यदि तुम पढ़ोगे लिखोगे नहीं तो तुम्हारा जीवन बेकार हो जाएगा . वे कहते थे कि पुस्तकों में ज्ञान का भंडार है, ये तुम्हें ऐसी बातों का ज्ञान कराती हैं जिनका ज्ञान कोई व्यक्ति आसानी से नहीं करा सकता .परंतु गोलू था कि इस ओर ध्यान ही नहीं देता था . कभी कभी उसे लगता कि उसके पिता सही कहते हैं .

उसे ध्यान से पढ़ाई करनी चाहिए और वह उसी दिन से पढ़ाई में मन लगाने की योजना बनाने लगता . परंतु पुस्तक उठाने के पहले ही उसे कुछ और सूझ जाता और वह उस काम में जुट जाता . यूं तो वह पढ़ाई में बुद्धू लड़का था, परंतु उसका दिमाग बहुत तेज था . वह सारी बातों को जल्दी ही समझ जाता था . गोलू अक्सर अपने पिता के पास दुकान पर चला जाया करता था . वहां पिता के काम में हाथ बंटाया करता था, जिससे पिता को यह तसल्ली होती थी कि चलो मेरा बेटा यदि पढ़ लिख नहीं सकता तो भी मेरी सामान की दुकान को तो ठीक प्रकार संभाल ही लेगा . गोलू 17 वर्ष का हो चला था . वह देखने में मोटा था, इस कारण सभी लोग उसे बड़ा ही समझते थे .

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गोलू की इच्छा होती थी कि लोग उससे इज्जत से बात करें . बड़ों की भांति उससे व्यवहार करें .एक बार गांव में दंगल हुआ तो गोलू ने निश्चय किया कि वह भी अखाड़े में उतरेगा . यदि किस्मत से वह जीत गया तो लोग उसकी ताकत से डरने लगेंगे और उसे गोलू पहलवान कह कर पुकारा करेंगे . गोलू मन ही मन कल्पना कर रहा था कि जब लोग उसे गोलू पहलवान जी कहेंगे तो उसे कैसा गर्व महसूस होगा . उसके पिता पहलवान के पिता कहलाएंगे . गोलू रोज जमकर व्यायाम करने लगा . वह खूब दूध बादाम खाता ताकि कुश्ती में जीत सके . परंतु उसने अपने माता पिता को अखाड़े में भाग लेने के बारे में नहीं बताया . धीरे धीरे कुश्ती का दिन आ पहुंचा . गोलू लंगोट बांधकर शरीर में तेल मालिश कर अखाड़े में पहुंच गया . परंतु उसे अखाड़े का अनुभव नहीं था, इस कारण उसे जल्दी ही चारों खाने चित होना पड़ा . कुश्ती में गोलू की पैर की हड्डी खिसक गई तो 5 लोग उसे घर पहुंचा आए . गोलू का हाल देखकर उसके मां बाप बहुत दुखी हुए, साथ ही गोलू को अखाड़े में भाग लेने के कारण अच्छी फटकार लगाई .

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समय बीतता गया और गोलू स्वस्थ हो गया . अब वह पढ़ाई खत्म करके पिता की दुकान पर बैठने लगा . वह रोज सुबह तैयार होकर पिता के साथ दुकान पर चला जाता . एक दिन गोलू के मामा पड़ोस के गांव से आए तो कुछ दिन के लिए उसे अपने साथ ले गए . उसका वहां खूब मन लग रहा था कि वह एक दिन मामा के साथ बाजार में गया . बाजार में उसने एक पहलवान की दुकान देखी, जहां लिखा था कल्लू पहलवान की दुकान . उस दुकान में एक मूंछों वाला रोबीला आदमी बैठा था, जिसके चारों तरफ 4-5 लोग उसके हाथ पांव दबा रहे थे . गोलू को इस बारे में जानने की बहुत उत्सुकता हुई, वह बोला मामा, यह कल्लू पहलवान क्या करता है. मामा ने चलते चलते बताया , यह यहां का मशहूर पहलवान है, लोग इसके नाम से डरते हैं . यह 8 लोगों को मार चुका है . इस कारण लोग इसे 8 मार खां कहते हैं .

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मामा की बात सुनकर गोलू बहुत अधिक प्रभावित हुआ . उसका खोया हुआ ख्वाब फिर जाग उठा . वह भी पहलवान बनने का सपना देखने लगा .एक दिन दोपहर को गोलू मामा के घर खाली बैठा था और भोजन का इंतजार कर रहा था . तभी उसने देखा कि मेज पर कुछ मक्खियां भिन भिना रही हैं . गोलू ने हाथ को जोर से घुमाकर मारा तो दो तीन मक्खियां मर गईं . तभी मामी उस कमरे में आ गई, वह बोली क्या कर रहे हो, गोलू, मैं भोजन अभी लाती हूं . गोलू बोला खाली बैठे क्या करूंगा. दो दो को मार चुका हूं . कुछ नहीं मामी जब तक भोजन नहीं आता, तब तक मक्खियां मारने के सिवा काम ही क्या है. बात बात में मामी भोजन लेकर आ गई . शाम को मामा के सामने मजाक होने लगा कि आज तो गोलू ने सात का खून कर दिया . गोलू ने अगले दिन किसी के सामने बातों बातों में जोर से कहा जानते नहीं, मैं 8 को मार चुका हूं . अब 9 वें तुम तो नहीं. वह आदमी डर गया, परंतु हिम्मत दिखाते हुए बोला भैया, 8 मार खां तो हमारे गांव में भी है . आठ मार खां होते तो बात कुछ और होती .

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गोलू ने मन ही मन निश्चय किया वह 9 मार खां बन कर रहेगा . अब वह मामी के घर बैठा बैठा मक्खियों को ढूंढ़ ढूंढ़कर मारा करता . एक दिन मामा ने उसे बताया कि वह उसके गांव में जा रहे हैं, गोलू तुरंत अपने घर जाने के लिए तैयार होकर आ गया . इतने दिन खाली बैठकर गोलू थोड़ा तगड़ा हो चुका था . गोलू और मामा चल दिए . रास्ते में मजाक में मामा ने पूछा क्यों बेटा, यहां खाली बैठकर कितनी मारीं. गोलू हंसकर बोला मामा तीस मार खां बन गया हूं . गोलू अपने घर पहुंचकर बहुत खुश था . रात्रि भोज के समय गोलू के पिता, मां व मामा सभी बैठे थे . तभी मामा गोलू के पिता से गंभीर मुद्रा में बोले भाई साहब जानते हैं, वहां गोलू ने तीस का खून कर दिया. सभी लोग अत्यंत आश्चर्य और कौतूहल भरी निगाहों से मामा की ओर देखने लगे . मामा बोले आप लोगों को यकीन न हो तो गोलू से पूछ लीजिए . गोलू के पिता घबराते हुए बोले बेटा, मामा क्या कह रहे हैं.

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गोलू ने सिर झुका कर उत्तर दिया जी पिता जी, मैं तीसमार खां बन गया हूं . गोलू के माता पिता एक दम घबराने लगे कि अब क्या होगा. तभी मामा ने असली बात बता दी और सबने चैन की सांस ली . धीरे धीरे पूरे गांव में चर्चा होने लगी कि गोलू तीसमार खां बन कर लौटा है . लोग गोलू की बेहतर सेहत देखकर यकीन करने लगे और गोलू के नाम से डरने लगे . कोई यह पूछने का साहस ही न करता कि गोलू ने किसको मारा है . गोलू ने एक बड़ी दुकान खोली, जिस पर बोर्ड लगाया तीसमार खां गोलू पहलवान की दुकान . बोर्ड पढ़कर दूर दूर से लोग गोलू के पास आने लगे . अब गोलू को कहीं जाना न पड़ता . लोग गोलू को उसके हिस्से की बड़ी रकम पेशगी दे जाते और दूसरी जगह जाकर गोलू पहलवान का नाम ले लेते . बस उनका काम आसानी से हो जाता . आस पास के गांवों में चर्चा करते कि पांच सात को मारने वाले तो बहुत सुने थे, पर तीसमार खां पहली बार सुना है . उस गांव के लोग गर्व से सिर उठा कर कहते भाई, हम तीसमार खां के गांव के रहने वाले हैं, हमसे पंगा मत लेना .

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अब गोलू को कहीं बहादुरी दिखाने की या पहलवानी दिखाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी . बड़े बड़े पहलवान उसको सलाम करने आते थे . गोलू तीसमार खां बनकर मजे से रहने लगा . एक बार की बात है गोलू के मोहल्ले में बड़े सर्राफ के यहां डाकुओ ने हमला बोल दिया . डाकू सारा सोना चांदी और जेवरात बांध ही रहे थे कि किसी ने गोलू को खबर दी पहलवान जी जल्दी चलो, सर्राफ के यहां से डाकू सब कुछ लूट कर लिए जा रहे हैं . उन्होंने चुपके से मुझे आपको बुलाने भेजा है . गोलू पहलवान की भीतर ही भीतर घिग्घी बंध गई . उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. परंतु यदि वह मना करता तो उसकी बहुत बदनामी होती . यह सोचकर गोलू पहलवान हाथ में डंडा ले, लुंगी बांध कर सर्राफ के घर की तरफ चल दिया . सर्राफ के घर के बाहर जाकर पहलवान जी भीतर से हिम्मत जुटाकर जोर से बोले मैं आ गया हूं तीसमार खां . भीतर कौन है, आकर पहले मुझसे मुकाबला करो . डाकुओं ने तीसमार खां का नाम सुन रखा था . वे घबरा गए, जल्दी से सारी बांधी हुई पोटली छोड़कर गलियों से होकर भाग निकले .

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डाकू खुश थे कि आज उनकी जान बच गई . सर्राफ ने बाहर आकर तीसमार खां के पैर पकड़ लिए और उसके आगे ढेर सारे जवाहरात रख कर बोला पहलवान जी, यह छोटी सी भेंट है . इसके लिए मना मत कीजिएगा . तीसमार खां ने भेंट उठाई और चुपचाप चल दिया . वह मन ही मन खुश हो रहा था कि आज की दुनिया काम को नहीं नाम को पूजती है . उसके लिए उसका नाम ही ख्याति दिलाने को काफी था . तो दोस्तों तभी से ये कहावत बन गयी की , झूट बोलने वाले को तीसमारखाँ ही कहते है. क्योकि सच्चे इंसान को खुद कभी भी बताने के जरूरत नहीं पड़ती है, उसका तो बल बाला अपने आप ही होने लग जाता है.

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1 thought on “तीसमारखाँ की कहानी, story in hindi”

  1. Abdul salman

    Mai bor ho gya hu gyani pandit

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