कंजूस धोबी की कहानी, miser stories in hindi

miser stories in hindi

कंजूस धोबी की कहानी

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miser story in hindi

बहुत साल पुरानी बात है , एक गांव मैं धोबी अपनी पत्नी और अपने एक बच्चे के साथ रहा करता था. धोबी बहुत ही ज्यादा ईमानदार था. उसे किसी तरह का लालच नहीं था. धोबी की पत्नी भी अपनी पति की कमाई हुई आय से बड़ी कुशलता से अपनी गृहस्थी चलाती थी. कुल मिलाकर उनकी जिंदगी बड़े आराम से हंसी खुशी से गुजर रही थी. धोबी अपने काम में बहुत निपुण था.

 

एक दिन वहाँ के राजा ने धोबी को अपने पास बुलवाया और रोज उसे महल में आकर कपडे धोने को कहा. धोबी ने भी बड़ी प्रसन्नता से राजा का प्रस्ताव मान लिया. धोबी को रोज राजा के कपडे धोने के के लिए एक स्वर्ण मुद्रा मिलती थी. इतना सारा पैसा पाकर धोबी की पत्नी भी बड़ी खुश हुई. अब उसकी जिन्दगी बड़े आराम से कटने लगी. घर पर किसी चीज की कमी नहीं रही और हर महीने अच्छी रकम की बचत भी होने लगी. धोबी, उसकी पत्नी और बच्चे सभी खुश रहने लगे. एक दिन शाम को जब धोबी अपना काम निपटा कर महल से अपने घर वापस जा रहा था, तो रास्ते में उसे एक आवाज सुनाई दी.

आवाज एक यक्ष की थी. यक्ष ने धोबी से कहा, मैंने तुम्हारी ईमानदारी के बड़े चर्चे सुने हैं. मैं तुम्हारी ईमानदारी से बहुत खुश हूँ और तुम्हें सोने की मुद्राओं से भरे 7 मटके देना चाहता हूँ. क्या तुम मेरे दिये हुए मटके लोगे. धोबी पहले तो थोड़ा डरा, पर दूसरे ही पल उसके मन में लालच आ गया और उसने यक्ष के दिये हुए मटके लेने का निश्चय कर लिया. धोबी का उत्तर सुनकर उस आवाज ने फिर धोबी से कहा, ठीक है सातों मटके तुम्हारे घर पहुँच जाएँगे. धोबी जब उस दिन घर पहुँचा, वाकई उसके कमरे में सात मटके रखे हुए थे.

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धोबी ने तुरन्त अपनी पत्नी को सारी बातें बताईं और दोनों ने मटके खोलकर देखना शुरू किया. उसने देखा कि 6 मटके तो पूरे भरे हुए थे, पर सातवाँ मटके आधा खाली था. धोबी ने पत्नी से कहा कोई बात नहीं, हर महीने जो हमारी बचत होती है, वह हम इस मटके में डाल दिया करेंगे. जल्दी ही यह मटके भी भर जायेगा. और इन सातों घड़ों के सहारे हमारा बुढ़ापा आराम से कट जायेगा. अगले ही दिन से धोबी ने अपनी दिन भर की बचत को उस सातवें में डालना शुरू कर दिया. पर सातवें मटके की भूख इतनी ज्यादा थी कि वह कभी भी भरने का नाम ही नहीं लेता था.

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धीरे धीरे धोबी कंजूस होता गया और मटके में ज्यादा पैसे डालने लगा, क्योंकि उसे जल्दी से अपना सातवाँ मटके भरना था. धोबी की कंजूसी के कारण अब घर में कमी आनी शुरू हो गयी, क्योंकि धोबी अब पत्नी को कम पैसे देता था. पत्नी ने धोबी को समझाने की कोशिश की, पर धोबी को बस एक ही धुन सवार थी, सातवां मटके भरने की. अब धोबी के घर में पहले जैसा वातावरण नहीं था.

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उसकी पत्नी कंजूसी से तंग आकर बात बात पर अपने पति से लड़ने लगी. घर के झगड़ों से धोबी परेशान और चिड़चिड़ा हो गया. एक दिन राजा ने धोबी से उसकी परेशानी का कारण पूछा. धोबी ने भी राजा से कह दिया अब मँहगाई के कारण उसका खर्च बढ़ गया है. धोबी की बात सुनकर राजा ने उसका मेहताना बढ़ा दिया, पर राजा ने देखा कि पैसे बढ़ने से भी धोबी को खुशी नहीं हुई, वह अब भी परेशान और चिड़चिड़ा ही रहता था. एक दिन राजा ने धोबी से पूछ ही लिया कि कहीं उसे यक्ष ने सात मटके तो नहीं दे दिये हैं. धोबी ने राजा को सातवें मटके के बारे में सच सच बता दिया.

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तब राजा ने धोबी से कहा कि सातों मटके यक्ष को वापस कर दो, क्योंकि सातवां मटके साक्षात लोभ है, उसकी भूख कभी नहीं मिटती. धोबी को सारी बात समझ में आ गयी. धोबी ने उसी दिन घर लौटकर सातों मटके यक्ष को वापस कर दिये. घड़ों के वापस जाने के बाद धोबी का जीवन फिर से खुशियों से भर गया था. कहानी हमें बताती है कि हमें कभी लोभ नहीं करना चाहिए. भगवान ने हम सभी को अपने कर्मों के अनुसार चीजें दी हैं, हमारे पास जो है, हमें उसी से खुश रहना चाहिए. अगर हम लालच करे तो सातवें मटके की तरह उसका कोई अंत नहीं होता. इसलिए हमे कभी भी अपनी छमता से ज्याद लालच नहीं करनी चाहिए.

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